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यूजीसी के नए इक्विटी नियम 2026: समानता का वादा या नई उलझनों की शुरुआत?

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देश के उच्च शिक्षा परिदृश्य में इन दिनों एक शब्द चर्चा में है — ‘यूजीसी इक्विटी रूल्स 2026’। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा 13 जनवरी, 2026 से लागू किए गए ये नए नियम, ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ कहे जाते हैं । इनका मकसद कॉलेज और यूनिवर्सिटी परिसरों में जाति, धर्म, लिंग या विकलांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को जड़ से खत्म करना बताया जा रहा है । लेकिन, लागू होने के तुरंत बाद ही ये नियम एक तूफानी बहस का केंद्र बन गए हैं। एक तरफ सरकार और यूजीसी इसे एक ऐतिहासिक और जरूरी कदम बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ विशेषकर सामान्य वर्ग के छात्रों और कुछ शिक्षाविदों में इसे लेकर गहरी नाराजगी और चिंता देखने को मिल रही है । सवाल यह उठ रहा है कि क्या ये नियम वाकई समानता लाएंगे, या फिर कैंपस में एक नए तरह के विवाद और विभाजन की बुनियाद रखेंगे?

नए नियमों की बुनियाद: रोहित वेमुला से सबक

इन नियमों को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना जरूरी है। यूजीसी को ये नए और कड़े नियम बनाने की जरूरत महसूस हुई 2016 की एक दर्दनाक घटना के बाद। हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहित वेमुला ने जातिगत भेदभाव के आरोपों के बीच आत्महत्या कर ली थी । इस घटना ने पूरे देश में उच्च शिक्षा संस्थानों में व्याप्त जातिगत पूर्वाग्रह और उत्पीड़न पर गंभीर सवाल खड़े किए।

रोहित वेमुला और पायल तडवी जैसे मामलों ने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान खींचा। अदालत ने इन घटनाओं को ध्यान में रखते हुए यूजीसी को निर्देश दिया कि वह 2012 के पुराने और लगभग अप्रभावी नियमों को बदले और एक मजबूत, कारगर ढांचा तैयार करे । नए नियमों का सीधा लक्ष्य परिसरों का माहौल SC, ST और OBC छात्रों के लिए अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण बनाना है। इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में ‘समानता और समावेशन’ पर जोर देने की दिशा में एक कदम भी माना जा रहा है ।

नए इक्विटी नियमों की मुख्य बातें: एक नजर में

यूजीसी के इन नियमों में सिर्फ सिफारिशें नहीं हैं, बल्कि सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। आइए, इनकी प्रमुख विशेषताओं को समझते हैं:

  • पहली बार OBC शामिल: पहले के दिशा-निर्देश मुख्यतः अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) पर केंद्रित थे। नए नियमों में पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा और सुरक्षा के दायरे में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है . इसके अलावा धर्म, नस्ल, लिंग, विकलांगता के आधार पर भेदभाव भी प्रतिबंधित है।
  • हर संस्थान में इक्विटी कमेटी और केंद्र: अब हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी को एक ‘समान अवसर केंद्र’ (Equal Opportunity Centre – EOC) स्थापित करना अनिवार्य होगा . यह केंद्र समानता को बढ़ावा देने, छात्रों को काउंसलिंग देने और शिकायत निवारण का केंद्र बनेगा। इस EOC के तहत एक ‘इक्विटी कमेटी’ गठित की जाएगी, जिसकी अध्यक्षता संस्थान का प्रमुख (कुलपति या प्राचार्य) करेगा . इस समिति में SC, ST, OBC, महिलाओं और दिव्यांगजन का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है .
  • सतर्कता के नए तरीके: नियम ‘इक्विटी स्क्वॉड’ और ‘इक्विटी एंबेसडर’ जैसी नई अवधारणाएं लाते हैं . इनका काम परिसर, विशेषकर छात्रावास और लैब जैसे ‘संवेदनशील स्थानों’ पर निगरानी रखना और समस्याओं की रिपोर्ट करना होगा।
  • 24×7 हेल्पलाइन और तेज कार्रवाई: एक राष्ट्रीय स्तर की 24 घंटे चलने वाली इक्विटी हेल्पलाइन स्थापित की जाएगी . शिकायत मिलने पर तेजी से कार्रवाई का प्रावधान है — 24 घंटे के भीतर कार्यवाही शुरू होनी चाहिए और 60 दिनों के भीतर जांच पूरी करनी होगी . गंभीर मामलों को सीधे पुलिस के पास भेजे जाने का भी रास्ता है .
  • अनुपालन न करने पर सख्त सजा: यूजीसी ने साफ कर दिया है कि इन नियमों का पालन न करने वाले संस्थानों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी . इसकी सूची में संस्थान का UGC की योजनाओं से बाहर किया जाना, नए कोर्स शुरू करने पर रोक, ऑनलाइन शिक्षा की मान्यता रद्द करना और अंततः संस्थान की मान्यता ही समाप्त करना शामिल है .

विवाद का सबब: क्यों हो रहा है विरोध?

इतने व्यापक और सख्त लगने वाले नियमों का विरोध क्यों हो रहा है? इसके पीछे कई गहरी और गंभीर चिंताएं हैं:

1. ‘सामान्य वर्ग’ की उपेक्षा और ‘उल्टा भेदभाव’ का डर
विरोध का सबसे मुखर स्वर सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों और संगठनों से आ रहा है। उनका मुख्य तर्क है कि नियम जातिगत भेदभाव को केवल SC, ST और OBC के खिलाफ होने वाली घटना के रूप में परिभाषित करते हैं . साथ ही, जिस इक्विटी कमेटी का गठन होना है, उसमें सामान्य वर्ग के किसी प्रतिनिधि के लिए कोई स्थान नहीं है . आलोचकों का मानना है कि इससे एक ‘पूर्वानुमानित दोष’ (Presumed Guilt) की स्थिति पैदा होती है, जहां यह धारणा बनती है कि भेदभाव का शिकार केवल आरक्षित वर्ग के लोग ही हो सकते हैं और दोषी सामान्य वर्ग के ही होंगे। इसे संविधान के ‘समानता के अधिकार’ और ‘कानून के समक्ष समानता’ के सिद्धांत के विरुद्ध बताया जा रहा है .

2. झूठी और दुरुपयोग वाली शिकायतों का खतरा
एक बड़ी चिंता यह है कि प्रतिस्पर्धी शैक्षणिक माहौल में इन नियमों का दुरुपयोग हो सकता है . आशंका जताई जा रही है कि प्रतियोगिता, निजी द्वेष या बदले की भावना से झूठी शिकायतें दर्ज की जा सकती हैं . नियम शिकायतकर्ता को गोपनीयता और सुरक्षा देते हैं, लेकिन आरोपी व्यक्ति के लिए ऐसी सुरक्षा या झूठी शिकायत के लिए दंड का प्रावधान स्पष्ट नहीं है। इससे डर है कि नियम विवाद सुलझाने के बजाय उन्हें हवा दे सकते हैं।

3. संस्थागत स्वायत्तता और शैक्षणिक स्वतंत्रता पर असर
कुछ शिक्षाविद और विश्लेषक इस बात से चिंतित हैं कि इतनी सख्त और केन्द्रीकृत निगरानी व्यवस्था विश्वविद्यालयों की संस्थागत स्वायत्तता को नुकसान पहुंचा सकती है . उनका तर्क है कि शैक्षणिक माहौल में विश्वास और खुलापन जरूरी है, और ‘निगरानी दल’ जैसे प्रावधान एक पुलिसिया वातावरण बना सकते हैं। यह प्रोफेसरों और छात्रों के बीच खुली बहस और शैक्षणिक स्वतंत्रता पर भी असर डाल सकता है।

4. संसाधनों की कमी और प्रशासनिक बोझ
भारत में हजारों कॉलेज ऐसे हैं जो बुनियादी संसाधनों और शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं . इन संस्थानों के लिए इतनी जटिल व्यवस्था—EOC बनाना, कमेटियों की बैठकें करवाना, नियमित रिपोर्ट तैयार करना—एक भारी प्रशासनिक बोझ साबित हो सकता है। आशंका है कि कई जगह सिर्फ ‘कागजी पूर्ति’ तक ही सीमित रह जाएगा और वास्तविक सांस्कृतिक बदलाव नहीं आ पाएगा।

जयपुर से उठी आवाज: ‘सवर्ण समाज समन्वय समिति’

विरोध सिर्फ ऑनलाइन बहस तक सीमित नहीं है। जयपुर में इस नियम के खिलाफ एक संगठित विरोध उभरा है, जहां कई सामाजिक संगठनों ने मिलकर ‘सवर्ण समाज समन्वय समिति (S-4)’ का गठन किया है . इसके सदस्यों ने जिला अधिकारी से मिलकर राष्ट्रपति को एक ज्ञापन भी सौंपा है . उनका आरोप है कि इन नियमों को व्यापक संसदीय बहस और सामाजिक सहमति के बिना लागू किया गया है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है .

सरकार और यूजीसी का पक्ष: सुधार की जरूरत

इस सब विरोध के बीच सरकार और यूजीसी का पक्ष स्पष्ट है। उनका मानना है कि दशकों से चली आ रही समस्या से निपटने के लिए पुराने नरम रवैये से काम नहीं चलेगा। संस्थानों के प्रमुखों को जवाबदेह बनाना, समयसीमा तय करना और सख्त दंड का प्रावधान करना ही नियमों को प्रभावी बना सकता है। उनका उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि एक ऐसा डर-मुक्त माहौल बनाना है जहां पीड़ित बिना झिझक शिकायत कर सके और भेदभाव करने वालों को यह पता हो कि उसकी कार्रवाई की गंभीर कीमत चुकानी पड़ सकती है।

निष्कर्ष: संतुलन की चुनौती

यूजीसी इक्विटी नियम 2026 निस्संदेह एक ऐतिहासिक और साहसिक पहल है। ये नियम उस दर्द और व्यवस्थागत उपेक्षा को स्वीकार करते हैं जिसका सामना दशकों से वंचित समुदायों के छात्र करते आए हैं। रोहित वेमुला जैसी त्रासदियों के बाद यह कदम उठाना अनिवार्य था।

हालांकि, इन नियमों की सफलता कागज पर उनकी सख्ती से नहीं, बल्कि कार्यान्वयन की बारीकियों और संतुलन से तय होगी। सबसे बड़ी चुनौती दो महत्वपूर्ण सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाने की होगी: एक तरफ भेदभाव के शिकार छात्रों को न्याय और सुरक्षा दिलाना, और दूसरी तरफ प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखते हुए यह सुनिश्चित करना कि नियमों का दुरुपयोग न हो।

इसके लिए आवश्यक है कि इक्विटी कमेटियां पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से काम करें। शिकायत दर्ज करने और जांच के दौरान आरोपी पक्ष को भी न्याय का पूरा अवसर मिले। झूठी शिकायतों से निपटने के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश होने चाहिए। साथ ही, इन नियमों का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि परिसरों में संवाद, संवेदनशीलता और सम्मान का संस्कार विकसित करना होना चाहिए।

आने वाला समय बताएगा कि क्या भारत के शैक्षणिक संस्थान इस जटिल चुनौती में सफल हो पाते हैं। क्या ये नियम वाकई में एक नए, समावेशी युग की शुरुआत कर पाएंगे, जहां हर छात्र की योग्यता और प्रतिभा को बिना किसी पूर्वाग्रह के पनपने का मौका मिले? या फिर ये नियम नए विवादों की जड़ साबित होंगे? इस सवाल का जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है, और यह पूरे देश की नजर उच्च शिक्षा के इस नए प्रयोग पर टिकी हुई है।

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